इंस्पेक्टर शमसुल आलम, जो बंगाल पुलिस में उपाधीक्षक और खुफिया अधिकारी थे, की 24 जनवरी 1910 को हत्या कर दी गई थी।
29 जनवरी 1910 को अनुशीलन समिति के 47 भारतीय राष्ट्रवादियों को इस हत्याकांड में गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। बाद में उनमें से 33 को बरी कर दिया गया।
जतिंद्रनाथ मुखर्जी और नरेंद्रनाथ बट्टाचार्जी को एक-एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
इस मामले ने अनुशीलन समिति के नेटवर्क और जतिंद्रनाथ मुखर्जी के कार्यों को अंग्रेजों की जांच के दायरे में ला दिया।
लाहौर षड़यंत्र केस:
लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी विरोध के दौरान, लाला लाजपत राय को गंभीर लाठियां मिलीं और अंततः उनकी मृत्यु हो गई।
इसने एक बार फिर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों को उकसाया।
17 दिसंबर 1928 को, जॉन सॉन्डर्स, सहायक पुलिस अधीक्षक, जो लाहौर में लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार थे, को भगत सिंह और शिवराम राजगुरु ने गोली मार दी थी। चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव थापर ने उनका समर्थन किया।
दिल्ली षडयंत्र केस:
इस घटना को दिल्ली-लाहौर षडयंत्र के नाम से भी जाना जाता है।
यह बंगाल और पंजाब में भूमिगत भारतीय क्रांतिकारी द्वारा आयोजित किया गया था और भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की हत्या के लिए रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में किया गया था।
बसंत कुमार विश्वास, अमीर चंद, और अवध बिहारी को इस दिल्ली षडयंत्र मामले के मुकदमे में दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी दी गई।
अलीपुर षडयंत्र केस
अलीपुर बॉम्बे केस ट्रायल मुजफ्फरपुर के जिला न्यायाधीश की हत्या के प्रयास को संदर्भित करता है।
अरबिंदो घोष को अलीपुर बम मामले में चित्तरंजस दास ने बचाव किया था।
अलीपुर बम कांड की साजिश वर्ष 1908 में हुई थी।
इसे मानिकटोला बम साजिश या मुरारीपुकर साजिश के रूप में भी जाना जाता है।
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है
हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है.
● हम वो आखिरी पीढ़ी हैं
जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।
● हम वो आखिरी लोग हैं…
जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, लँगड़ी टांग, आइस पाइस, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे, सितोलिया जैसे खेल खेले हैं।
● हम वो आखिरी पीढ़ी के लोग हैं
जिन्होंने चिमनी , लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।
● हम उसी पीढ़ी के लोग हैं…
जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।
● हम उस आखिरी पीढ़ी के लोग हैं
जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।
जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।
जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती घोटी है।
जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है. और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है
जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे. और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे।
जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया हैं काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।
जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे प्रोग्राम सुने हैं।
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है
हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है.
● हम वो आखिरी पीढ़ी हैं
जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।
● हम वो आखिरी लोग हैं…
जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे. और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे
● हम वो आखिरी पीढ़ी के लोग हैं
जिन्होंने चिमनी , लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।
● हम उसी पीढ़ी के लोग हैं…
जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।
● हम उस आखिरी पीढ़ी के लोग हैं
जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।
जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।
जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती घोटी है।
जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है. और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है
जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।
जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे ❣️🙏
बात उस समय की है जब मैं जिला जामताड़ा मे इंटरमिडियट मे था | मै जब डेली शाम को अपने कोचिंग को जाता तो रोज आते-जाते मुझे एक बूढ़ी भिखारन महिला मिलती जो रेलवे स्टेशन पर भीख माँगती, जिसे मैं डेली देखता था | हालांकि महिला बुजुर्ग थीं और कपड़े फटे पुराने होते थे मगर देखने मे ऐसा लगता था जैसे जब ये जवान रही होंगी तो बेहद खूबसूरत रही होंगी |
मै जब प्रति दिन रेलवे फाटक पार करके कोचिंग से लौटता तो रोज देखता कि शाम को दो व्यक्ति आकर उस महिला से पैसे ले लेते थे | वह बूढ़ी महिला उन दोनों व्यक्तियों को देखते ही डरने लगती थी |
मैंने सोचा- 'हो सकता है इनका भीख मांगना ही इनका पेशा हो और ये दोनों जो इससे पैसा ले लेते है इनके कोई रिस्तेदार हों |
और हाँ, मुझे कभी-कभी उस भिखारन महिला को देखकर ऐसा महसूस भी होता था कि शायद वह महिला मुझसे कुछ कहना चाह रही हो |
एक दिन मुझसे नही रहा गया | मेरे मन में उस महिला की दुर्दशा देखकर दया उठी और उसके तथा उन दो व्यक्तियों, जो रोज उससे पैसा लेकर चले जाते थे, उन सब के बारे में विस्तार से जानने की जिज्ञासा हुई और एक दिन मै चुपके से उस भिखारन महिला के पीछे-पीछे चल पड़ा, लेकिन यह क्या----------?
मैं चौक गया ! महिला एक रेड लाइट एरिया वाले इलाके में प्रवेश करने लगी और वहां एक कोठे पर चढ़ गई | मेरे मन मे आया और मै सोचने लगा की क्या ये महिला वेश्या है....? और अगर नही तो वो आखिर वह यहाँ क्यों आयी हैं....? मुझे अब उस महिला से घृणा होने लगी, लेकिन मैं यहाँ ठहरने वाला कहां था |
दूसरे दिन मैं एक फर्जी कस्टमर बनकर उस बुजुर्ग महिला जिस कमरे मे गयीं थीं उसके पास पहुँचने में सफल हो गया और मैंने जो दृश्य वहां का देखा, उससे मुझे खुद से नफरत होने लगी...मैं क्यों आया ऐसी गन्दी जगह पर....!!
मुझे क्या पड़ी थी... इन सब मे - बदबूदार कमरे, कहीं ढोल की थाप और घुंघरुओं की मधुर ताल पर अश्लील नर्तन करती वेश्याएं, मुंह में पान की गिलौरी दबाए और मसनद पर लेटे ललचाई नजरों से उन वेश्याओं के अंग अंग को निहारते ग्राहक |
पर मैंने देखा वहां वह बूढ़ी महिला नहीं थी | मैंने दूसरी तरफ नजर घुमाई, तो उस महिला को एक काल कोठरी में बन्द पाया | उसकी तरह वहाँ और भी कई महिलायें थी | लगभग 50 से ज्यादा महिलाये होंगी..... घुप्प अंधेरा, नीचे दरी पर बैठी घुटनों को उठाए और उस पर सिर झुकाए कुछ महिलायें बैठी थीं |
मैंने वहां से लौट जाना ही उचित समझा-
यहां की स्थिति में सुधार मेरे वश की बात नहीं थीं, लेकिन आज मुझे उस बूढ़ी महिला की सच्चाई का पता चल गया था | अगले दिन मैंने छुट्टी ले ली और आज मै फिर स्टेशन गया | स्टेशन पर वह बूढ़ी महिला पहले दिन की तरह ही भीख मांगने के लिए बैठी थी और जमीन पर अपने एल्युमिनियम का कटोरा पिट-पिटकर लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रही थी |
मैं पहले तो उसके करीब जाकर बैठा और उसे प्यार से "माँ" के संबोधन से पुकारा | माँ शब्दों को सुनकर वह अचंभित हो गई और बेचारी फूट-फूट कर रोने लगी |
मैने उसका परिचय पूछा, माँ आप कौन हो ? कहां से आयी हो ? बच्चे और पति कहां हैं...? वह रोती रही और रो-रोकर उसने जो दास्तान सुनाई, मेरे रोंगटे खड़े हो गए और इस समाज से मुझे घृणा होने लगी |
उस बूढ़ी भिखारन ने कहा कि - बेटा हम प्यार मोहब्बत के झांसे मे पड़कर अपने माँ बाप के विरुद्ध जाकर दूसरे से शादी कर के घर से भाग गये थे....जब तक मन नही भरा तब तक इस्तेमाल करता रहा.. और जिस दिन मन भर गया न बाबू , तब हमें धोखे से कोठे पर लाकर बेच दिया....!!
यहां प्रायः जितने भी लड़कियों को तुम देख रहे हो न सब अपने प्यार मोहब्बत के नाम पर विश्वास करके घर से माँ बाप के विरुद्ध जाकर भागी लड़किया हैं...... और बाद मे जब हमें बेच दिया गया तो फिर हमें मजबूर किया जाता है वेश्या बनने के लिए |
ना चाहते हुए भी ग्राहकों को खुश करना पड़ता है | सब नोचते हैं हमें भेड़िए की तरह मानो कितने दिनों से उनकी प्यास बुझी ना हो | जब तक जवानी रहती है बेटा, तब तक हम कोठे की शान रहते हैं और जब शरीर के अंग साथ देना छोड़ने लगते हैं और ग्राहक मिलने बन्द हो जाते हैं, तब मालिक हमें पागल घोषित कर देता है और सड़कों पर, रेलवे स्टेशन पर भीख माँगने के लिए बैठा देते है और डेली उनके भेजे दलाल हमसे पैसे वसूली करते हैं | पैसे नही देने पर या विरोध करने पर मार पीट भी करते हैं | अब बूढ़ी हो चुके हम महिलाओ के पास उतनी शक्ति तो नही होती की हम उनका विरोध कर पायें.... हम बस जिंदा लाश बन उसके इशारे पर सारा काम करते रहते हैं | जब हम भीख माँगने के लायक भी नहीं बचते, तो हमें ये लावारिश सड़क पर ले जाकर फेंक जाते हैं |
यही है हम वेश्याओ की कहानी- हम भी सोचते हैं की कास हमने अपने माता-पिता के विरुद्ध ना जाकर गलत कदम ना उठाये होते तो हमारा भी एक हँसता खेलता घर-परिवार होता |
हर मोड़ पर हमारी आंखें तलाशती हैं कि कहीं किसी मोड़ पर कोई अपना मिल जाए, जो इस जिल्लत भरी जिंदगी से छुटकारा दिलाए |