मुगल सम्राट हुमायूँ (1530–1540, 1555–1556 ई.) ने अपने शासनकाल में आर्थिक संकट और धातु की कमी से निपटने के लिए एक अनोखा प्रयोग किया—चमड़े के सिक्कों का उपयोग। यह विचार चीन और मंगोलियाई शासन व्यवस्था से प्रेरित था, जहाँ कभी-कभी धातु के अभाव में कागज़ या चमड़े पर आधारित मुद्रा का प्रयोग किया जाता था।
हुमायूँ ने सीमित स्तर पर चमड़े के सिक्के जारी करवाए, जिन पर आधिकारिक मोहरें और मूल्य संकेत अंकित होते थे। इन सिक्कों को धातु के सिक्कों की तरह प्रचलन में लाने का प्रयास किया गया, ताकि चांदी और सोने की बचत की जा सके।
हालाँकि, इस प्रयोग को जनता और व्यापारियों ने स्वीकार नहीं किया। नक़ली चमड़े के सिक्कों का तेज़ी से बढ़ना, कम विश्वसनीयता, और सरकारी व्यवस्था की कमजोरी के कारण यह प्रयास अत्यंत अल्पकालिक रहा। नतीजा यह हुआ कि हुमायूँ की चमड़े की मुद्रा को जल्द ही वापस लेना पड़ा।
आज यह प्रयोग भारतीय मुद्रा इतिहास में एक रोचक लेकिन असफल उदाहरण के रूप में दर्ज है, जो बताता है कि आर्थिक नीतियों की सफलता के लिए जनता का विश्वास और प्रशासनिक नियंत्रण कितना आवश्यक होता है।