भारत के मध्यकालीन इतिहास में शेरशाह सूरी (1540–1545 ई.) न केवल प्रशासनिक सुधारों के लिए प्रसिद्ध थे, बल्कि उनकी मुद्रा व्यवस्था भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने भारतीय मौद्रिक प्रणाली को एकरूप, विश्वसनीय और स्थिर बनाने के लिए तीन प्रमुख प्रकार की मुद्राओं को व्यवस्थित रूप से लागू किया:
1. दाम – तांबे का सिक्का (Copper Coin)
दाम तांबे से निर्मित था और यह सामान्य जनता के दैनिक लेन-देन में सबसे अधिक उपयोग होता था। इसका मूल्य कम होने के कारण यह बाज़ार में छोटे व्यापार के लिए अत्यंत उपयोगी था।
2. रुपया – चांदी का सिक्का (Silver Rupee)
यही ‘रुपया’ आगे चलकर भारत की मूल मुद्रा बना। शेरशाह सूरी द्वारा जारी किया गया चांदी का रुपया 178 ग्रेन (लगभग 11.5 ग्राम) का होता था। इसकी वजन-मानक प्रणाली इतनी सटीक और विश्वसनीय थी कि मुगल शासन और बाद के कालों में भी इसे अपनाया गया।
3. असर्फी – सोने का सिक्का (Gold Asharfi)
असर्फी उच्च मूल्य की सोने की मुद्रा थी, जिसे बड़े व्यापार, धन-संग्रह, उपहार, तथा राजकीय लेन-देन में उपयोग किया जाता था। यह शाही प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
शेरशाह की मुद्रा प्रणाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता, भरोसा और स्पष्टता प्रदान की। उनकी स्थापित वजन एवं धातु-मानक व्यवस्था सदियों तक प्रचलित रही और भारतीय मुद्रा इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है।