प्राचीन भारत में मिट्टी से बने सिक्कों का उपयोग एक महत्वपूर्ण आर्थिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहा है। इन सिक्कों को टेराकोटा सिक्के कहा जाता है। टेराकोटा का अर्थ है पकी हुई मिट्टी, और इसी तकनीक से यह सिक्के तैयार किए जाते थे।
टेराकोटा सिक्कों पर अक्सर देवी-देवताओं, पशुओं, प्रतीकों या स्थानीय शिल्पकला की आकृतियाँ उकेरी जाती थीं। ये सिक्के न केवल लेन-देन के लिए बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों, उत्सवों और सामाजिक पहचान के प्रतीक के रूप में भी उपयोग किए जाते थे।
समय के साथ धातु के सिक्कों का प्रचलन बढ़ने से टेराकोटा सिक्कों का उपयोग कम हो गया, लेकिन पुरातत्व में आज भी इन्हें अत्यंत मूल्यवान माना जाता है। ये प्राचीन समाज की कला, अर्थव्यवस्था और जीवन शैली की झलक देते हैं।